Monday, 9 September 2013

बस! सुन रहा हूँ तुम्हारी ओढ़नी के तार तार होने की बेबस कराह..


तुम्हें छेड़ा गया होगा.
लाज उघर गई होगी.
तुम रोई होगी ज़ार ज़ार..
सरे बाज़ार.
ठीक वैसे ही जैसे दामिनी रोई होगी
तार तार होने से पहले...
गुस्सा आया होगा तुम्हारे भाइयों को
जैसे इंडिया गेट पर फूटा था
दामिनी के तमाम बहन भाइयों का.
उसे भी चोट बहुत लगी होगी
जिस पर फूटा होगा तुम्हारे भाइयों का गुस्सा
दर्द भी हुआ होगा..
उसे, उसके भाईयों को..
चाचा ताउवों को भी.
जैसे राम सिंह के घरवालों को आज भी हो रहा है.
मारा होगा पलटकर.
किसे पता कि
तुम्हारे और उसके
इतने हमदर्द निकल आयेंगे सड़कों पर
आँखें लाल, सड़कें लहूलुहान.
पता न कहाँ कहाँ से निकाल निकाल
गर्म तवे पर चढ़ाए गए कितने पुराने घाव.
कहाँ हो तुम..
तुम क्यों नहीं..
चुपचाप रह गई
सह गई
जैसे सहती आयी हो सदियों से.
न तुम्हारे भाइयों को गुस्सा आता
न उनके भाइयों को.
सौहार्द बना रहता..
होली आती
तुम अपनी फटी ओढ़नी
से खुद को ढँक लेती
और बाहर इस साल भी
कौमी एकता के दो रंग
संग संग होते
साले नकली और एकदम कच्चे..
ईद आती
सेबईयाँ भी बाँटते
सियासती स्वाद चाटते
गले मिलते
तुम अपनी फटी ओढ़नी
चुपचाप सी लेती
किसी सियासी धागे से..
चुपचाप..


(मुझे नहीं पता... तुम्हारी ओढ़नी का रंग क्या है, केसरिया या हरा. बस मैं सुन रहा हूँ उसके तार तार होने की बेबस कराह)

कमलेश मिश्र

No comments:

Post a Comment