Friday, 30 August 2013

सत्याग्रह "अन्ना आन्दोलन" का नाट्य रूपांतरण


फ़िल्म सत्याग्रह मेरी नज़र से.....
 अगर प्रकाश जी से पूछा जाए ''आपकी नज़र में आपकी कौन से फिल्म बेहतरीन है- राजनीति या सत्याग्रह?. तो जवाब देते उन्हें शायद सौ बार सोचना पड़ेगा. पर दर्शकों से पूछ लीजिये. राजनीति सत्याग्रह से बहुत आगे है. प्रकाश जी की ताजातरीन फिल्म है सत्याग्रह. सत्याग्रह पहली फिल्म नहीं है जो ब्लाक स्तर से लेकर कॉर्पोरेट सेक्टर तक में खूंटा गाड़कर बैठे भ्रष्टाचार की कलई खोल रही हो. सत्याग्रह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठी पहली आवाज़ भी नहीं है. और खुद निर्देशक प्रकाश झा जी की सफ़ाई भी है कि सत्याग्रह "अन्ना आन्दोलन" का नाट्य रूपांतरण भी नहीं है. ऐसे में समझना ज़रा टेढा हो जाता है कि आखिर "सत्याग्रह" है क्या? फिर भी कोशिश करते हैं.
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ "सत्याग्रह" एक बहुत ही आकर्षक अपील है. यह आकर्षण ही "आन्दोलन के मंच" पर सिनेमाई सितारों को मायानगरी से सत्तानागरी तक खींचता है. इस आकर्षण में ही मीडिया मंच पर ही अपना घर बना लेता है. यह आकर्षण ही एक संजीदा फिल्म निर्देशक से "सत्याग्रह" बनवा लेता है. हालाँकि इस मोहक आकर्षण से बचकर "सत्याग्रह" बनी होती तो बेशक इस आजमाए विषय पर भी एक बेहतरीन "सत्याग्रह" बन पड़ी होती. और तब शायद प्रकाश जी का दावा कि "इसका अन्ना आन्दोलन से कुछ लेना देना नहीं है", सत्य लगता. पर सच तो यह कि "सत्याग्रह" कई बार की कोशिशों के बावजूद अन्ना आन्दोलन के साए से बाहर निकल ही नहीं पाती. और AAP के खुश होने के लिए इतना बहुत है.
इसे सिर्फ विडम्बना तो नहीं कह सकते कि कि "द्वारका आनन्द" की लड़ाई में हीरो कोई और बन जाता है. और अन्न जल त्याग से सूखे "द्वारका आनन्द" प्राण तज कर भी दर्शकों की सहानभूति नहीं बटोर पाते. जबकि इसी रंगमंच पर जब "सारांश" का कोई "बी. वी. प्रधान" और "धूप" का कोई "प्रोफ. एस के कपूर" अपनी लड़ाई खुद लड़ता है तो, कदम दर कदम हारता हुआ भी जीत का हीरो बनता है. हीरो. जिसे दर्शक अपने अंदर जीना चाहता है. यहाँ न दर्शक "द्वारका आनन्द" को जी रहा है न मानव राघवेन्द्र को. ऐसे में तमाम भरी भीड़ में भी  "द्वारका आनन्द" की लड़ाई अकेली रह जाती है. "द्वारका आनन्द" के महानायक बनने की एक उम्मीद तब ज़रूर जगती है जब वह अड़ियल डीएम को जोरदार चांटा मारते हैं. भ्रष्ट राजनीतिक - प्रशासनिक सिस्टम के भारी भरखम पहिये तले कुचल कर मार दी गई अखिलेशों की ईमानदारी क्या काफी नहीं एक बाप को जिद्दी महानायक बनाने के लिए. पर भाई जी (प्रकाश जी ) का भीड़ प्रेम "द्वारका आनन्द" को अपनी ही भीड़ में खो जाने को मजबूर कर देता है. फिल्म का आख़िरी हिस्सा बेशक याद दिलाता है कि नोवाखली की हिंसा बापू को बेहद आहत किये थी जैसे अम्बिकापुर की हिंसा दादू को करती है. पर यह बहुत ही अखरता है कि जो गोली दादू की जान ले लेती है वह "मानव' को सिर्फ घायल करके ही क्यों छोड़ देती है! यह दूसरे चरण के सत्याग्रह की  कोई तैयारी तो नहीं!! ताज्जुब ये भी कि इतनी बड़ी लड़ाई एक बलराम की गिरफ्तारी को ही क्यों अपने पहले चरण की जीत मान लेती है!
बहरहाल. अमित जी की अतुल्य प्रतिभा में "द्वारका आनन्द" के कैरेक्टर को और भी मज़बूती मिल सकती थी. पर यह तभी मुमकिन था जब पटकथा अन्ना आन्दोलन के मोह से बाहर निकल पाई होती. कॉर्पोरेट सेक्टर की सम्मोहनी दुनिया से यूँ मुक्त हो जाना क्या आज के मनुष्य के लिए इतना ही आसन है जितनी आसानी से "सिनेमाई मानव" हो जाता है. हो भी जाना पड़ता है. सत्याग्रह के कई मार्ग "संसदीय" मुक्ति तक भी गए ही है. शायद बौध भिक्षुवों का कारवाँ सांसारिक मोह माया से मुक्ति का अब कोई स्थाई ज्ञान भी नहीं दे पाता है. पत्रकार महोदया ने इस "मानव" स्वभाव को पहचान  भी लिया है. अजय देवगन अपने कैरेक्टर में फिट हैं. भाई जी की फिल्म में अर्जुन रामपाल शायद इस बार भी "राजनीति"क कारणों से फिट किये गए हैं. पर कोई दूसरा भी होता तो उतना ऐंठ ही लेता जितना रामपाल ऐंठे हैं. करीना कपूर..आप भी सोचिये...किन कारणों से फिट की गई हैं. पोस्टर पर जमती हैं भाई. फिल्म को भाव भी लगता है. वैसे यास्मिन आज की टीवी जर्नलिस्ट की सटीक प्रेजेंटेशन हैं. जिसे ये नहीं पता कि उसकी पत्रकारीय प्रतिब्धातायें क्या हैं. जो ये नहीं समझती कि रिपोर्टर स्टोरी कवर करने लिए है. स्टोरी में फिट हो जाने के लिए नहीं. जो ये नहीं जानती कि शूट करते वक़्त कैमरामैन के हाथ पकड़ पकड़ कर डायरेक्शन देने से फ्रेम बिगड़ जाता है. कैमरामैन बिदक जाता है. बहुत दिनों के बाद अमृता राव को फुल फिल्म जगह मिली है. प्रभावित करने लायक क्या है. पर उनकी मौजूदगी बुरी नहीं है. बलराम सिंह को दिल से कौन चाहता है. पर वो तो फिट होता रहेगा जी. समाज में भी, सिस्टम में भी, फिल्म में भी. मनोज बाजपई कैरेक्टर को अपनी चतुराई से दर्शनीय बना रहे हैं.ताली बटोर रहे हैं.
फिल्म का म्यूजिक अच्छा है. गाने अच्छे और "रस के भरे" हैं.  हाँ बैकग्राउंड स्कोर और बेहतर हो सकता था. स्क्रीनप्ले और स्क्रिप्ट किसी को बिखरी हुई नहीं लगती. पर कई बार एक ही जगह पर गोल गोल घूमती नज़र आती है. फिर अखरती है. और हाँ पोस्टर देखकर इंडिया गेट देखने के झांसे में मत फंसियेगा. कैमरा दिल्ली से भी बहुत दूर है.  
प्रकाश जी निर्देशक अच्छे हैं जी. पर इस बार वही अन्ना वाले आकर्षण में उलझ कर रह गए हैं. वैसे आन्दोलन, सत्याग्रह आदि के किस्से रोमांचित तो करते ही हैं जी. सो मन बने, तो देख भी लीजिये, बहुत पैसा लगा है प्रोडूसर का. आखिर कहाँ से वसूलेंगे.  

...कमलेश मिश्र

Saturday, 24 August 2013

"अ लॉट कैन हैपन ओवर कॉफ़ी".


वह ९० का दशक था. श्रीलंकाई जातीय हिन्सा और LTTE हमारे समाचार बुलेटिन पर जैसे घर ही बना चुके थे. "जाफना" और जहांनाबाद में जैसे कोई दूरी ही न थी. जाफना की आग कई काबिल हिन्दुस्तानी अफसरानों की जान लेने से से आगे बढ़कर हमारे पूर्व प्रधानमंत्री तक आ गई....आगे बहुत कुछ...जाफना आज शांत है. पर जाफना का दर्द कोई और कई "मेजर विक्रम" आज भी ढो रहे हैं.
मद्रास कैफ़े सिर्फ फिल्म भर नहीं है. भारत और श्रीलंका के राजनीतिक कालखंड के बेपनाह दर्द भरे उस अंश का "विजुअल डॉक्यूमेंटेशन" है, जो तब समाचार बुलेटिन के तौर पर न चाहते हुए भी हमारी उत्सुकता का जगाये रखे था..आज क्या..अब क्या..और आगे क्या?
सुजीत सरकार(डायरेक्टर), सोमनाथ और शुभेन्दु( राइटर), जॉन अब्राहम (एक्टर प्रोडूसर), कमलजीत (सिनेमाटोग्राफर) और चद्रशेखर(एडिटर)..की टीम ने मद्रास कैफ़े के रूप में भारतीय सिनेमा का वह चैप्टर लिख दिया है जो फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टिट्यूट्स में न पढ़ाई जाए तो शायद सिनेमा के स्टूडेंट कुछ बेहतर सीखने से चूक जाएँ.
भारतीय सनेमा के लिए यह भी बेहद सुकून देने वाली बात होनी चाहिए कि उसे जॉन सरीखे संजीदा प्रोडूसर मिल रहे हैं. जॉन भी अपनी एक्टिंग के लिए "मद्रास कैफ़े" और सुजीत सरकार को याद रखेंगें.
बदूकों और गोलों की दहाड़ से पैदा हो रही जाफना की मुर्दा शांति और भारतीय प्रधानमंत्री की ह्त्या जैसी बातें काफी हैं  मानवता और राष्ट्रवाद के खूब सारे भावनात्मक नारे गढ़ने और "एक हीरो टाइगर" या "बहादूर विनोद' पैदा के लिए लिए. पर असल मिशन इसकी इजाज़त नहीं देता. तभी तो "मेजर विक्रम" अपनी पत्नी को खो देने की पीड़ा तब जाकर अपनी जेब से निकालता है जब उसे आगे बयान करने को कुछ और नहीं रह जाता. वक़्त मरहम है पर कसौली की सर्द वादियाँ भी गर्म जाफना की तपिश को कम कहाँ कर पाती. और यह ठीक भी है. आग की हकीक़त भी समझनी चाहिए.
घर का ही कोई "बाला" बला जाता है. और इलीट लन्दन और चमकते बैंकाक की आँखों में शातिर चमक भर जाती है कि वह जाफना में लाशों के ढेर पर अपने मुनाफे का लंगर डाल सके.
"मद्रास कैफ़े" जैसी फ़िल्म यूँ ही थोड़ी बन जाती है. सुजीत सरकार, सोमनाथ और शुभेन्दु, जॉन और कमलजीत में भी कॉफ़ी के तमाम दौर चले होंगे. शायद तब जाकर "मद्रास कैफ़े" जैसी फ़िल्म को एक बेहतरीन शक्ल मिली होगी. कॉफ़ी बेचने वाला भी यूँ ही थोड़ी लिख देता है. "अ लॉट कैन हैपन ओवर कॉफ़ी".
मद्रास कैफ़े की टेबल पर भी क्या कुछ नहीं पक गया. पर खुफियातंत्र समय पर ख़बरदार हो जाए और. उसकी सूचना पर फौरी अमल हो ही जाए तो..ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ कैसे बने! जया साहनी (नर्गिस फाकरी) पत्रकारीय प्रतिष्ठा को कायम रखती हैं तो शायद इसलिए कि वह ९० को दौर था. टेलिविज़न का शोर कम था. अखबार की धार भी तेज़ थी.
सिद्धार्थ बासु, पियूष पाण्डेय, दिबांग, अजय रत्नम, प्रकाश बेलवादी, राशि खन्ना..सबका चयन और अभिनय अच्छा है.
पहले शॉट से लेकर, आख़िरी फ्रेम तक मद्रास कैफ़े का विजुअल फ्लो गजब का है. "बेहतरीन सिनेमाटोग्राफी" सिर्फ इतना भी कह दें तो कमलजीत नेगी की तारीफ हो ही जायेगी. पर "सिनेमाई प्रवाह' के नज़रिए से देखें तो कमलजीत की तारीफ के लिए बेहतरीन से कुछ "बेहतर" शब्द बनाने होंगे. एक्शन और वॉर फ़िल्म एडिटर के कौशल की परख करते हैं. चन्द्रशेखर की समझ सुजीत और कमलजीत की मेहनत को सार्थक कर देती है. मद्रास कैफ़े का साउंड ट्रक आपको सिचुएशन से बाँध लेता है. विनोद कुमार. ये हैं फ़िल्म के प्रोडक्शन डिजायनर. इनका ज़िक्र न हो तो बेइमानी होगी. सुजीत कि कल्पनाशीलता को इन्होंने रूप देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है.                        
जाईये "मद्रास कैफ़े" देखिये. मज़े के लिए नहीं. सिनेमाई सम्मोहन के लिए.
मजे के लिए तो है ही मद्रास की जगह चेन्नई. तेज़ दौड़ती...

.......कमलेश मिश्र 

Sunday, 18 August 2013

दाग़ अच्छे हैं और दाऊद भी.


Once Upon A Time In Mumbaai Dobaara

(एक छोटी सी समीक्षा. ठीक लगे तो बता दीजिएगा. शायद अगली भी लिखने के बारे में सोचूं.)

दाग़ अच्छे हैं और दाऊद भी. दाग़ को अच्छाई का सफ़ेद जामा नहीं पहनाया जाएगा तो डिटर्जेंट पाउडर को अपनी करतब दिखाने का मौक़ा नहीं मिलेगा. दाऊद दाग़ है, पर अच्छा है. उसका होना हर हाल में अच्छा है. जब दाग़ दाऊद है तो चाहें जैसा हो डिटर्जेंट, बिकेगा. उसके दम पर बिकेगा. दिखा ही था "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई" ब्रांड का डिटर्जेंट खूब बिका था. दाग़ जब तक है, उसकी कथा जब तक है, डिटर्जेंट बेचते रहा जाए. दाग़ का महिमा मंडन ही तो करना है. लो जी "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई" ब्रांड का डिटर्जेंट - "दोबारा" ख़रीद लो. पर इस बार ठग लिया है जी. न दाग़ अच्छा है. न डिटर्जेंट. मुंबई पर दोबारा काबिज होने के मकसद से दुबई से आया दाऊद - शोएब - स्क्रिप्ट राइटरों के शब्द सम्मोहन में उलझकर कब डॉन से जिद्दी आशिक बन जाता है, पता ही नहीं चलता. न कोई बड़ी वसूली होती है न कोई बड़ा गैंगवार. पर - शोएब - के गुर्गे ऐलान कर देते हैं कि "भाई ने मुंबई फिर से जीत ली जी", "चलो दुबई निकल लो जी". एक दुबके हुए हुए 'रावण" को मारने की जिद दाऊद एक फ़ोन कॉल के जरिये ही पूरा कर सकता था, पर इतने भर से पूरा फ़िल्मी प्लाट तो तैयार हो नहीं सकता.
"दुबई", "क्रिकेट" और "पराई खूबसूरत बीवी" को जीते बिना भी दास्ताने दाऊद नहीं बयान हो सकती. सो लो जी पहले ही ये सब भर देते हैं. एक ब्लास्ट तो बनता है. तो ये भी लो जी. अब क्या. ब्लास्ट का बदला!!! चलो बम्बई. यहाँ आकर ये दाऊद नाम का शेर-ए- शहर शायरीनुमा डायलाग के चक्कर में ऐसे उलझता है कि बंदूकों से ज़्यादा शब्दों से खेलता नज़र आता है. तालियाँ....(हॉल में लगती हैं भाई) खैर. डॉन जाहें जितना ताक़तवर हो वह भी डरता है. और सबसे ज्यादा अपने साए से, अपने वफादारों से. माफिया का पूरा खेल तंत्र ही इसी डर का चेन रिएक्शन होता है. "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई - दोबारा" का शोइब ही अगर दाऊद है तो समझ से परे है कि वह असल ज़िंदगी में इतना खौफ़नाक कैसे हो गया! रियल ज़िंदगी में भी डॉन लोगों के होठ कम बंदूकें जियादा बोलती हैं. डॉन की धाक ही कम बोलने में होती हैं. अजय देवगन "कम्पनी" में और पहली वाली ""वन्स अपॉन.." में दिखा चुके हैं. यहाँ शोइब है कि मुंह खोलने का हर मौक़ा तलाशता रहता है. मुंबई दोबारा जितने आया शोइब जैस्मिन को हिरोइन और अपना बना लेने के चक्कर में आधी से जियादा फिल्म निगल जाता है. यह भी बुरा नहीं लगता अगर फिल्म का नाम "दाऊद इन लव.."टाइप का होता. प्रोमो और प्रमोशनल स्ट्रेटेजी में आप क्लियर होते कि कुछ लव टाइप की कॉमेडी देखने जा रहे हैं. यहाँ तो आप हॉल तक खयाल बुनते जाते हैं कि अंडरवर्ल्ड के कुछ अनछुए दिलचस्प पहलू से रूबरू होंगे. पर यहाँ तो सोनाक्षी और इमरान जैसे स्टार आपको खड़ी टैक्सी की खचर पचर दिखा कर पका रहे हैं. वैसे फिल्म के शुरुवाती सीन में ही अक्षय सोफी के सीने की साइज़ ले रहे होते हैं, उसी से समझ में आ जाता है कि ये "शोइब" कुछ गंध जरूर मचाएगा.
खैर फिल्म तो डायरेक्टर की होती है. जिसको जैसा बोला गया बोला, किया. अक्षय लुक में जम रहे है पर, धाक भी जमा रहे हैं पर गलत जगह. ऊपर से बोल बोल कर खुद ही खुद को हल्का कर रहे हैं. इमरान एक्टर अच्छे हैं. किरदार में फिट भी हैं. पितोभाश त्रिपाठी को जितना मिला, ठीक किया है. सोनाक्षी सिन्हा नए दौर की हीरोइनों में "एक्टर" हेरोइन हैं. फिल्म में जगह भी खूब मिली है, पर मिलन साहेब उनके ज़रिये एक महत्वाकांक्षी हिरोइन की भावनाओं को ज़रुरत भर नहीं उभार सके. रावण - महेश मंजेकर- जैसा ही कोई रहा होगा जो शायद "प्रेम चोपड़ा" की खाल में रह कर दाऊद से उसकी मुंबई छीनने का ख्वाब देखता होगा और दाऊद उसे सड़क पर पटककर पिट देता होगा. वैसे जान लीजिये कि ऐसे वैसे से लड़कर कोई दाऊद नहीं बनता जी. इसलिए यहाँ फिल्म में भी कोई टक्कर का होना चाहिए था. फिर शोइब साहेब न इतनी शायरी करते न जैस्मिन के इतने चक्कर काटते. फिल्म में कुछ मज़ा भी आता.
डायलाग तो भाई कमाल कमाल के हैं. अंडरवर्ल्ड पर बेस्ड फिल्म में भी आप हंसते हंसते लोट पोट हो लेंगे. म्यूजिक तो प्रीतम जी का ही है. पर पहली मुंबई वाली बात नहीं. इश्क वो बला है...अच्छा बन पड़ा है इसलिए कि पिछला ट्रैक साथ है. तैयब जी...ठीकठाक गीत है. सिनेमेटोग्राफी और एक्शन आजकल खूब इम्प्रूव कर रहा है. इसलिए इस पॉइंट पर बहुत जियादा रिझने की जरूरत नहीं. तबतक जबतक कोई असाधारण बात न दिखे.
हाँ इस समीक्षा को कमाई के आंकड़ों से न जोडेंगे. जैसा हमने देखा वैसा लिखा है. मन करे तो आप भी देख लें. शायद देख भी ली हो आपने. पैसा वसूल तो नहीं है. वैसे दाऊद ज़िंदा है. दुबई तक ही गया है. नहाने. नहा धोकर "तिबारा" भी आ सकता है.
क्योंकि दाग़ और डिटर्जेंट का बाज़ार बहुत बड़ा है भाई.

-कमलेश मिश्र