Sunday, 18 August 2013

दाग़ अच्छे हैं और दाऊद भी.


Once Upon A Time In Mumbaai Dobaara

(एक छोटी सी समीक्षा. ठीक लगे तो बता दीजिएगा. शायद अगली भी लिखने के बारे में सोचूं.)

दाग़ अच्छे हैं और दाऊद भी. दाग़ को अच्छाई का सफ़ेद जामा नहीं पहनाया जाएगा तो डिटर्जेंट पाउडर को अपनी करतब दिखाने का मौक़ा नहीं मिलेगा. दाऊद दाग़ है, पर अच्छा है. उसका होना हर हाल में अच्छा है. जब दाग़ दाऊद है तो चाहें जैसा हो डिटर्जेंट, बिकेगा. उसके दम पर बिकेगा. दिखा ही था "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई" ब्रांड का डिटर्जेंट खूब बिका था. दाग़ जब तक है, उसकी कथा जब तक है, डिटर्जेंट बेचते रहा जाए. दाग़ का महिमा मंडन ही तो करना है. लो जी "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई" ब्रांड का डिटर्जेंट - "दोबारा" ख़रीद लो. पर इस बार ठग लिया है जी. न दाग़ अच्छा है. न डिटर्जेंट. मुंबई पर दोबारा काबिज होने के मकसद से दुबई से आया दाऊद - शोएब - स्क्रिप्ट राइटरों के शब्द सम्मोहन में उलझकर कब डॉन से जिद्दी आशिक बन जाता है, पता ही नहीं चलता. न कोई बड़ी वसूली होती है न कोई बड़ा गैंगवार. पर - शोएब - के गुर्गे ऐलान कर देते हैं कि "भाई ने मुंबई फिर से जीत ली जी", "चलो दुबई निकल लो जी". एक दुबके हुए हुए 'रावण" को मारने की जिद दाऊद एक फ़ोन कॉल के जरिये ही पूरा कर सकता था, पर इतने भर से पूरा फ़िल्मी प्लाट तो तैयार हो नहीं सकता.
"दुबई", "क्रिकेट" और "पराई खूबसूरत बीवी" को जीते बिना भी दास्ताने दाऊद नहीं बयान हो सकती. सो लो जी पहले ही ये सब भर देते हैं. एक ब्लास्ट तो बनता है. तो ये भी लो जी. अब क्या. ब्लास्ट का बदला!!! चलो बम्बई. यहाँ आकर ये दाऊद नाम का शेर-ए- शहर शायरीनुमा डायलाग के चक्कर में ऐसे उलझता है कि बंदूकों से ज़्यादा शब्दों से खेलता नज़र आता है. तालियाँ....(हॉल में लगती हैं भाई) खैर. डॉन जाहें जितना ताक़तवर हो वह भी डरता है. और सबसे ज्यादा अपने साए से, अपने वफादारों से. माफिया का पूरा खेल तंत्र ही इसी डर का चेन रिएक्शन होता है. "वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई - दोबारा" का शोइब ही अगर दाऊद है तो समझ से परे है कि वह असल ज़िंदगी में इतना खौफ़नाक कैसे हो गया! रियल ज़िंदगी में भी डॉन लोगों के होठ कम बंदूकें जियादा बोलती हैं. डॉन की धाक ही कम बोलने में होती हैं. अजय देवगन "कम्पनी" में और पहली वाली ""वन्स अपॉन.." में दिखा चुके हैं. यहाँ शोइब है कि मुंह खोलने का हर मौक़ा तलाशता रहता है. मुंबई दोबारा जितने आया शोइब जैस्मिन को हिरोइन और अपना बना लेने के चक्कर में आधी से जियादा फिल्म निगल जाता है. यह भी बुरा नहीं लगता अगर फिल्म का नाम "दाऊद इन लव.."टाइप का होता. प्रोमो और प्रमोशनल स्ट्रेटेजी में आप क्लियर होते कि कुछ लव टाइप की कॉमेडी देखने जा रहे हैं. यहाँ तो आप हॉल तक खयाल बुनते जाते हैं कि अंडरवर्ल्ड के कुछ अनछुए दिलचस्प पहलू से रूबरू होंगे. पर यहाँ तो सोनाक्षी और इमरान जैसे स्टार आपको खड़ी टैक्सी की खचर पचर दिखा कर पका रहे हैं. वैसे फिल्म के शुरुवाती सीन में ही अक्षय सोफी के सीने की साइज़ ले रहे होते हैं, उसी से समझ में आ जाता है कि ये "शोइब" कुछ गंध जरूर मचाएगा.
खैर फिल्म तो डायरेक्टर की होती है. जिसको जैसा बोला गया बोला, किया. अक्षय लुक में जम रहे है पर, धाक भी जमा रहे हैं पर गलत जगह. ऊपर से बोल बोल कर खुद ही खुद को हल्का कर रहे हैं. इमरान एक्टर अच्छे हैं. किरदार में फिट भी हैं. पितोभाश त्रिपाठी को जितना मिला, ठीक किया है. सोनाक्षी सिन्हा नए दौर की हीरोइनों में "एक्टर" हेरोइन हैं. फिल्म में जगह भी खूब मिली है, पर मिलन साहेब उनके ज़रिये एक महत्वाकांक्षी हिरोइन की भावनाओं को ज़रुरत भर नहीं उभार सके. रावण - महेश मंजेकर- जैसा ही कोई रहा होगा जो शायद "प्रेम चोपड़ा" की खाल में रह कर दाऊद से उसकी मुंबई छीनने का ख्वाब देखता होगा और दाऊद उसे सड़क पर पटककर पिट देता होगा. वैसे जान लीजिये कि ऐसे वैसे से लड़कर कोई दाऊद नहीं बनता जी. इसलिए यहाँ फिल्म में भी कोई टक्कर का होना चाहिए था. फिर शोइब साहेब न इतनी शायरी करते न जैस्मिन के इतने चक्कर काटते. फिल्म में कुछ मज़ा भी आता.
डायलाग तो भाई कमाल कमाल के हैं. अंडरवर्ल्ड पर बेस्ड फिल्म में भी आप हंसते हंसते लोट पोट हो लेंगे. म्यूजिक तो प्रीतम जी का ही है. पर पहली मुंबई वाली बात नहीं. इश्क वो बला है...अच्छा बन पड़ा है इसलिए कि पिछला ट्रैक साथ है. तैयब जी...ठीकठाक गीत है. सिनेमेटोग्राफी और एक्शन आजकल खूब इम्प्रूव कर रहा है. इसलिए इस पॉइंट पर बहुत जियादा रिझने की जरूरत नहीं. तबतक जबतक कोई असाधारण बात न दिखे.
हाँ इस समीक्षा को कमाई के आंकड़ों से न जोडेंगे. जैसा हमने देखा वैसा लिखा है. मन करे तो आप भी देख लें. शायद देख भी ली हो आपने. पैसा वसूल तो नहीं है. वैसे दाऊद ज़िंदा है. दुबई तक ही गया है. नहाने. नहा धोकर "तिबारा" भी आ सकता है.
क्योंकि दाग़ और डिटर्जेंट का बाज़ार बहुत बड़ा है भाई.

-कमलेश मिश्र

6 comments:

  1. Bhaiya, Shandar! Beyond criticism..its a detailed article with natural, creative storytelling style..!

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  2. shauke didar hai to najar paida kar ....aapne film ko vihangam dristi se dekhane ki kosis ki hai

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